Wednesday, October 14, 2015

हरिया के बैल

चित्र : सौमेंद्र मजूमदार, कहानी : कपिल चांडक 
हरिया के दो बैल, जय-वीरू उसके घर के चिराग हैं। हरिया और धानु के कोई जन्माना (संतान) तो था नहीं, इन बैलो में उनके प्राण रमे थे। खली-चोकर उनको पहले, बाद में चूल्हे को आग दिखाई जाती थी। पछाई जाति के बैल, ऊंचा डील-डोल, बड़े बड़े नुकीले सींग, पठ्ठे भरे हुए, लेकिन सीधे इतने की गऊ भी झेंप जाए। हरिया खेत से निकलता तो लगता दो गबरू जवान बेटे का अक्खड़ बाप इठला रहा हो।  

नांद से मुँह उठा कर जय बोला "मालिक, मालकिन को कह रहे थे की इस बार देखना अपनी जमीन सोना उगलेगी"
वीरू : "क्यों न हो? मालिक इस बार दूर शहर से अच्छे बीज लाये है, साथ ही कीड़ो की दवाई भी लाये है, पिछली बार कीड़ो ने बड़ा कहर बरपाया, रही कसर ख़राब मौसम ने कर दी थी"।

जय : "मालिक रोटी भी गिन कर खाए और हम गुड खाए, बैलों के भाग ऐसे तो नहीं देखें"।

वीरू : "किसान और बैल की किस्मत एक ही रात में लिखी जाती हैं मेरे भाई। कौन किसका सहारा हैं मरते दम तक तय नहीं होता"।

जय : "मालिक ने तो खुद अपनी किस्मत पर ताले लगा रखे है, मालिक के भाईसाहब को देखो, जगनू से जगन सेठ बन बैठा हैं, दस गाँव के सरदार मिल कर भी मालदारी में टिक ना पाये। सालों पहले एक फैक्ट्री को अपनी जमीन बेच शहर में बस गया, कपड़ों का व्यापार किया, देवयोग से परदेस तक उनके लिबास के अनुरागी बसे   पड़े  है"

वीरू : "जगन सेठ! दोज़ख में भी जगह ना मिले उस अधमी को; पहले बाउजी को झांसा दे कर बड़ी जमीन हथियाई, तीन गऊ, दौ  बैल, बकरी सब हड़पी। यहाँ तक भी प्रयाशित करता तो शायद देवदूत नरक की यंत्रणाओं में पक्षपात कर लेते; पर वो छुरेबाज़ तो गाय, बैल-बकरी सब को कसाई खाने को बेच गया"

जय: "हमारे नक्षत्र ऊँचे थे जो छोटे भाई हरिया मालिक की बाँट में आये, नहीं हमारी खाल के जूते पहन कर कोई  रस्ता नाप रहा होता। ये मालिक नहीं देवदूत हैं, आज तक छड़ नहीं उठाई, फूल की पंखुड़ी से भी खरोंच आये तो लपक कर वैद को बुला लाये"

इन बैलों को तंगी के दिनों में नांद में डाली गयी फ़ीकी सूखी घास भी इस खरे वात्सल्य के साथ स्वादपूर्ण लगती हैं। हरिया के नेकदिली और जगन सेठ की दयाहीनता को बढ़ा-चढ़ा कर बताने में खोये बैलों की संकेन्द्रता को धानु की खरखरायी  टेर ने भेदा।

धानु : "पंडितजी के लड़के का टीका अचानक ही तय हो गया, अब एकाएक रुपये कहा से लाये? फ़सल कटेगी तब देंगे, ये बोल कर लिए थे। सारे पैसे बीज, खाद-पानी में लग गए, सुबह तकाज़ा कर गए, तीन दिन में देना है"

हरिया : "ऊपर वाले ने चिंता दी हैं तो दूर भी वो ही करेगा, नाहक़ ही फ़िकर कर रही हैं"

धानु : "गांव का कोई घर नहीं बचा जिसके उधार से हमारे घर रोटी नहीं सिकि हों, कहाँ से इंतेजाम हो? मैं तो कह-कह कर ठठरी हो गयी की शहर चल-चलो, भाई साहब भी कई मर्तबा बोल गए, लेकिन पता नहीं कौन खज़ाना गढ़ा हैं जो यही धूनी रमी रहती हैं"

दो दिन में खेत की लिखा-पढ़ी हो गयी, पांच रूपये सैकड़ा सूद पर लिए कर्ज़े से पंडितजी का हिसाब किया गया। पंडितजी के लड़के का टीका धूम धाम से हुआ, हरिया खूब नाचा।  मालिक को ज़माने बाद उल्लासित देख, जय-वीरू ने भी आपस में विनोदपूर्ण सींग मिलाये।

एक-एक कर के सारे दिवस, धानु के पाकगृह के भंडारे की तरह तेजी से खर्च हुए। हरिया की मेहनत रंग लायी, धरती ने खूब सोना उगला, मटर की फसल आस-पास के खेतो को चिढ़ा रही थी।

उधर शहर से जगन सेठ का बड़ा बेटा ऋषि अपने पालतू कुत्ते डुग्गु के साथ हर वर्ष की भाँति छुट्टियाँ बिताने अपने हरिया चाचा के घर आया। ऋषि को प्रकृति का सानिध्य बहुत पसंद हैं। शहर की चिल्ल्पों से दूर प्राणवायु से पूर्ण निर्वात में बसेरा उसे बड़ा भाता हैं। 

डुग्गु : "इतनी तेज गर्मी, मच्छर चैन नहीं ले रहे, बगल में किसीने खेंत सींचा हैं, यंहा तक कीचड़ आ रहा हैं, वहाँ एसी में पेडिग्री खाने को मिलता है, सोने को नरम-नरम बिस्तर हैं, मालकिन हफ्ते में एक बार शैम्पू से नहलाती हैं, बालों में कंघी करती हैं और यंहा के कुत्तो के शरीर जूओं से भरे हैं। छोटे मालिक (ऋषि) सेठ जी (जगन सेठ) को कह रहे थे की में तो डुग्गु के साथ वहीँ गाँव में बस जाऊंगा, अजीब ख़ब्ती हैं"

वीरू : "इतने नख़रे तो शहर की लड़कियों के नहीं होते, हा हा हा..."

जय-वीरू भी डुग्गु के साथ मखोली में जुट गए। रात भोजन पश्चात सब सुनहरे सुबह के सपनों में खो गए।


सुबह हरिया ने दोनों बेलो को बैलगाडी से जोड़ा और टिटकारी भरते हुए खेत के मटर को लेने चला, मटर के दाम भी बढे हुए हैं, "इस बार सारा कर्ज़ा चुका कर, खेत छुड़ाऊंगा, बैलो के लिए पक्का अस्तबल बनवाऊंगा, धानु को भी नए कपड़े और चूड़ी दिलाऊंगा फिर पूरे साल की रसद भंडारे में रखवा दूंगा" हरिया ख्याल करते बढ़ रहा था।

सहसा मौसम ने करवट ली, पूरा आसमान गाढ़ा हो गया, हरिया का दिल बैठ गया।  जय-वीरू की उछृंखलता की उम्र मानो कट गयी, भारी ओलावृष्टि हुयी, देखते ही देखते खेतों का सोना पिघल कर कही लुप्त हो गया।  हरिया को लगा जैसे उसके आखों के सामने कोई उस के बच्चे पर छुरी चला रहा हो और वो बस असहाय देख रहा हो।

घर पर धानु ज़र्द पड़ी थी मानों शरीर पर बिजली गिरी हो, हरिया के चेहरे का पक्का रंग वेदना की परकाष्ठा से और मलिन हो गया। जय-वीरू टकटकी लगाए शुन्य में विलुप्त जान पड़ते थे, वही डुग्गु जिसे खेतों से कोई विशेष मोह नहीं था, इस बात से शोकग्रस्त था की आज खाना मिलेगा या नहीं। ऋषि पास के ही जंगल में फेरी लगा कर लौटा था। रो-रो कर पथरा  गयी आँखों और घुटे हुए गले के विसादपूर्ण गुटबंदी से धानु ने आह ली, "खेत भी गया, गाँव में कुछ रहा नहीं, ऋषि के साथ शहर चलते हैं, वहाँ से नयी शुरुआत करेंगे"।

हरिया : "मेरे बैल, मेरे बच्चे हैं, ये हैं तो सब हैं। इन्हे यहाँ ऐसे कैसे अकेला छोड़ जाउ?"
धनुः "इन्हे बेच देते है" हमारे खेत में ना सही किसी और के खेत में रहेंगे"
हरिया: "इन बे-जुबानो को कोई चाबुक दिखाए, नकेल डाले, सोच कर ही ह्रदय उठ जाता हैं" मैं अपने बच्चो को ऐसे नियति के भरोसे नहीं छोड़ सकता"
धानु : "इन्हे भी शहर ले चलो"
हरिया : "आधी से ज्यादा उम्र गाँव की मिट्टी में लोट कर निकाली हैं, शहर में खूंटे पर बाँध कर मुझे इन्हे मारना नहीं हैं"

ऋषि : "हरिया चाचा ठीक कह रहे हैं चाची, शहर में रखा क्या हैं? कर्कश कान फाड़ू शोर, चौबीसों घंटे कोल्हू के बैल की तरह दौड़ने वाले मशीनी आदमी, थोड़ी दिखावट, थोड़ी मिलावट और फिर उस पर छिड़की हुयी थोड़ी सजावट, यहाँ गाँव में फुर्सत हैं बेफिक्री, निर्दोषता हैं।

उधर जय ये बाते सुन डुग्गु और वीरू से बोला, "भूख हैं, बेबसी भी हैं यहाँ, पेट भरा हो तो फूलो से खुशबू आती हैं, सूरज से पहले छत हो तो घुटन नहीं सुकूं मिलता हैं। अगर ऋषि यहीं रहता हैं तो सालो बाद जब कभी अपनी बेटी पराई करेगा तो शहर का घर ही ढूंढेगा, बिटिया को गाँव में कभी नहीं देगा, और बेटों को शहर बसाएगा, उनसे कहेगा, हमने तो अपनी ज़िंदगी अभावो में काट ली, बस तुम्हारी संवर जाएं" 

उधर हरिया, धानु  और ऋषि से "शहर में भी जाना चाहता हु, मेरी भी इस इच्छा हैं की बचे हुए काले बाल वही सफ़ेद हो, लेकिन जब जय-वीरू का ख्याल आता हैं लगता हैं की किसीने दोनों पैरो में सौ-सौ किलो के पत्थर बांध दिए"

दोनों बैल भावपूर्ण सजल नेत्रों से मालिक की बातों का रस्वादन कर रहे थे की डुग्गु ने बीच में खलल डाला, "शहर में किसी चीज़ की कमी नहीं हैं, ये चाहिए फ़ोन घुमाओ, वहाँ जाना हैं गाडी उठाओं, हर बीमारी का इलाज हैं वहां के अस्पतालों में, पता नहीं छोटे मालिक की बुद्धि में सेंध लग गयी क्या? कहते हैं गाँव का जीवन  सच्चा हैं, न कोई फ़िक्र न कोई आगे बढ़ने का दवाब"            
  
वीरू : सरपंचजी का बेटा उस दिन पँचायत में कह रहा था की गाँव में कोई बड़ा स्कूल नहीं हैं, अस्पताल भी दूर हैं। हर गांववासी अपने बच्चो को भविष्य को ले कर चिंतित हैं। कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं। काम धंधा नहीं। घर कच्चे हैं।  पक्की सड़क का वादा हर चुनाव में कच्चा रह जाता हैं। लोग बेहतरी के लिए शहर जा रहे हैं, वहाँ ऊँची पढ़ाई कर के अच्छी कमाई कर रहे हैं, वहीँ शादी कर के पक्को घरो में बस जाते हैं"

जय : "इंसानो का तो भगवान ही मालिक है, इंसान किसी भी तरह से खुश नहीं नहीं है, उन्नति के लिए शहर जाता है, हर चीज़ पाने के बाद कहता हैं की वापस गाँव जाना है क्योंकि वहां पर बहुत कुछ छूट गया। गाँव में रहते हुए कहता है की गाँव में तरक्की नहीं ज़िंदगी बोझिल हैं, सुख सुविधाये नहीं हैं फिर वापस शहर भागता हैं। जो चीज़ उसे मिलती वो उसकी कद्र नहीं करता, अपनी जमीं को याद करना ग़लत नहीं हैं लेकिन अपनी वर्तमान स्थिति को सदैव कोसना ये जिसको इंसान से खुद चुना हैं, कहाँ की समझदारी हैं। हम जानवर मस्त हैं हर हाल में खुश रहते है"

काली रात के बाद सबेरा हमेशा नयी आशा ले कर आता हैं, लेकिन कुछ अभागो के लिए काली रात दिन भर रहती हैं।  हरिया का अँधेरा अभी छटा नहीं था, डूबता सूरज को लोगों के लिए तमाशा बन जाता हैं। हरिया की कंगाली उसकी भलमानहसता से जल्दी प्रसिद्धि पा गयी, साहूकार ने तकादो के तीर से हरिया की प्रभुता को तार-तार कर दिया। अनंततः सूद चुकाने में विफल रहे किसान ने घर गिरवी रखवा सूदखोर से पीछा छुड़ाया।

हरिया का दीवालापन चरम पर था,  मांस हड्डियों से चिपक गया, आँखे सिकुड़ कर गड्डो में जा गिरी, मन्दभाग्य धानु उम्र में दूनी हो गयी। बैलो की ठिठरिया निकलने लगी। लेकिन अभी तक सभी ज़िंदगी जीने की ज़िद पर डटे थे।

जय : "ओलो ने बड़ा जुल्म किया हैं। कई घर उजाड़ दिए। राघव काका ने तो पूरे परिवार को ही ज़हर दे कर सारे दुःखो से तार दिया। बंशी भी कई दिनों से लापता हैं लोगों को अंदेशा हैं की तालाब में कूद गया"  
वीरू : "जय, ये कीड़े मारने वाली दवाई यहाँ किसने रखी?
जय : "बच गयी होगी पहले की; लेकिन पहले तो यहाँ नहीं थी, हे देव क्या चल रहा है इस घर में?  मेरे भगवान, मालिक को दिग्भ्रमित होने से बचाये। सबने कितना ज़ोर दिया की जगन सेठ के पास चले जाओ, यहां तो दुर्दशा को ढोना ही हैं"

डुग्गु : "भाई मेरा मालिक कंगाल हो जाता तो मैं तो भाग निकलता, मैं क्यों अपनी जिंदगी तबाह करू इनके आगे।

जय-वीरू ने तिरस्कार भरी नज़रो से डुग्गु के इस कथन को दुत्कारा।  फिर विचार किया की क्यों न हम लोग भाग जाए, हम ही न होंगे तो मालिक अपने बड़े भाई के पास चले जाएंगे और विभीषिका से छुटकारा पाएंगे, हमारे प्रति अगाध स्नेह ने ही तो इन्हे यहाँ जकड़ा हैं।  लेकिन अगर भागे भी तो कहा आस-पास के गाँव से कौन हमें नहीं जानता, हरिया और उसके बैल तो यहाँ अलौकिक प्रीत का प्रतिरूप माने  जाते हैं।

सुबह हरिया पास से सूखी घास मांग लाया, नाँद में डालते हुए बोला, बेटा थोड़े दिन की बात है, खली चोकर और गुड़  से नांद भर दूंगा। बैलो को देखा की सो रहे हैं, इतनी देर तक सो रहे हैं? हे राम! इनके मुह से झाग कैसे निकल रहा है, शरीर नीला पड़ गया, जीवन के सभी लक्षण विलुप्त हैं।  हरिया को लगा किसी ने अँधेरी खाई में धक्का दे दिया, चिंगाड़ के साथ, किसी शव की भाँति जमीन पे जा पड़ा। हजारो अनवरत प्रहार झेल कर भी खड़ा रहने वाला हरिया, मेले में माँ बाप से बिछुड़े बालक सा बेसुध इधर-उधर भाग रहा था। पास खड़ा डुग्गु स्तब्ध था की मालिक के प्रति प्रणय की अति ये ही होती है? दोनों बैल इसलिए कीड़ो की दवाई (ज़हर) चाट गए ताकि इनके मालिक को इसे खाने की नौबत ना आये। किसान की खुदखुशी की खबरें तो आती रहती हैं, उसकी अकाल मौत को रोकने के लिए उसके बैल अपनी ईहलीला समाप्त कर दे संभवतया पहली बार ही हुआ होगा। हरिया को अपनी जकड़ से मुक्त कर दोनों बैलों ने उसके शहर जाने का विकल्प खोल दिया था। धन्य हैं हरिया और धन्य हैं हरिया के बैल जय-वीरू।  

रचियता: कपिल  चाण्डक 
Author: Kapil Chandak

Monday, August 24, 2015

O Sanam (Lucky Ali) by Kapil Chandak



It's A fan made video dedicated to Lucky Ali Sir.
Singer : Kapil Chandak, Guitarist : Bhakt Bahadur Thapa

Plz do not expect professional singing :P

Friday, May 9, 2014

Awards & Recognition

I am Re-producing here under 'A published article on me'. Following article was published at Local magazine in February 2014. (Images put separately from various articles on me.)


An Article published in Dainik Bhaskar (A Leading News Paper) on 23.01.2014
“It was 31st December 2013 when 'Kapil Chandak' became overnight star worldwide. He won 'World Champion' title in "International Freelance Talents Championship". He never had any idea that one day he will have a global reorganization for his hobbies and passion.

"International Freelance Talents Championship" organized global story writing tournament in June-13. Total 311 authors/creative people were selected worldwide out of million entries invited by IFTC. 70 matches were played among those 311 authors in 8 rounds on various theme based stories given to contestants. Tournament lasted for 7 months. All stories reviewed/judged by renowned movie directors, authors, musicians, etc.  
Remarkable thing was that being not a professional writer but still managed to defeat all full time authors throughout the tournament. He still kept people by surprised by balancing his professional as well as personal life equally during the contest. 

An Article published at In-house Magazine of TATA group of Company on
Me (Kapil Chandak) towards multiple achievements in various field.
His stories are appreciated worldwide, which are primarily non-fiction and realistic and based on social welfare, patriotism, camaraderie, child recalled. Every story aims of bringing changes in thinking and outlook on life is to advance of readers. A few creative work of him can be read at his personal blog www.kapilchandak.com.

I was awarded a silver medal for 'Best Blogger' given by Indian Comics Fandom
as My Blog got second highest votes across India (2013)
He has also won several awards in various fields. Recently being awarded a silver medal for 'Best Blogger' given by Indian Comics Fandom as he got second highest votes across India.
In addition to his love of writing, He also found of music and guitar. In 2007 he was awarded for 'Best Guitar Learner'.

He has been impressed with Indipop singer-composer Lucky Ali. In 2004, he made exclusive presentation containing 170 slides on Lucky Ali called "Lucky World". In which Lucky Ali biography, filmography, singing career, video and music album reviews, Guitar Chords etc. were included. This presentation had been downloaded by fans around the world, record over 20,000 times within a week.

Kapil being a big fan of comics and art, founded 'Super Commando Dhruva Fan Club' on Yahoo Group in 2004. which become world's biggest fan club of any Indian superhero only within a period of 10 months. It was considered admirable effort to prop up Indian comics industries by adding and got that scattered and lost fans together.

During school and college days, Kapil was a favorite among teachers who represented the school's volleyball team in 1999. He had also been captain of cricket team for many years in society. Along with taking overwhelming participation in cultural activities in school, also being honored as a Captain of 'Red Cross' team.

In 1998 he was rewarded for trivia contest at state level by immediate Minister of Education of Rajasthan.

Me (Kapil Chandak) "GOT HONOURED" on social platform
by Hon'ble Justice, MLA and President of Maheshwari Samaj in 2014
Nearly 10 years in corporate life he got several opportunities to be rewarded for outstanding performance. In 2014 he also got honored and awarded for his remarkable talent by Hon’ble Justice, MLA and President of Maheshwari Samaj on social platform.  
Happily living with Mother, spouse Radhika and 2.5 years old daughter Tweety, cheerful and optimistic Kapil believes life is huge sea full of opportunities and happiness.”  
Awarded by Voltas Limited for being "Best Performer"
Me (Kapil Chandak) Got 'Best Performer' Award two times in a row (2013 & 2014)
Me (Kapil Chandakwith World Champion Awards in International Freelance Talents Championship



Thursday, September 26, 2013

सुपरहीरो/Superhero



"रोहित… रोहित कहाँ है? जल्दी आ शुरू हो गया, 'कैप्टेन कपिल और बिजली का चोर' 

…'कैप्टेन कपिल' और उसका साथी 'चमटू' कमअक्ल सुपरहीरो हैं जिन्होंने दुनिया बचाने का बेडा अपने ऊपर उठा कर बेडा गर्क किया हुआ है... 

दोनों अपने गोपनीय अड्डे पर काला बुल्ला (उनका परम्परागत शत्रु) पर अनुसंधान कर रहे थे। अचानक बिजली चली जाती है, चारो और स्याह अंधकार फैल जाता है जैसे किसी काले हब्शी ने पूरे शहर को गले लगा लिया हो। कबूतरों की गुटर-गू से जिन्दगी की सुगबुगाहट जान पड़ती है नहीं तो अँधेरा, खौफ़ का ही पर्याय है। 

चमटू ने खिड़की से बाहर देखा, "कैप्टेन पूरे शहर की लाइट गुल है, कहीं ये काला बुल्ला का कोई नया दांव तो नहीं है?, लेकिन वो तो जेल मैं बंद हैं!"

कैप्टेन कपिल: "मेरे अनुमान से, उसने जेल में गश्त लगा रहे, सिपाही को बोला होगा, देख-देख उधर उड़ने वाला कबूतर, फिर सिपाही ने ऊपर देखते हुए ताज्जुब किया होगा, कहाँ है? कहाँ हैं?, मौका पा कर उसने जेल के पास खड़े उस सिपाही की गर्दन पकड़ ली होगी और एक हलके सधे हुए वार से उसे चित करके उसकी जेब से चाभी निकल कर भाग गया होगा, रास्ते में लिफ्ट नहीं मिलने पर उसने बेहोश सिपाही की जेब से निकाले हुए बस पास का इस्तेमाल कर सीधे पॉवर हाउस पहुँचा होगा और फिर वहां गड़बड़ी की होगी ताकि पूरे शहर की बिजली चली जाए और काला बुल्ला अँधेरे में खो जाए।"

चमटू: क्या बात है बॉस क्या गेस किया है यू आर रियली अ सुपर-डुपर सुपरहीरो, लेकिन कैप्टेन यहीं बात अगर आप अपने पेंट की ज़िप बंद करके बोलते तो, दर्शक ज्यादा इम्प्रेस होते, ही ही ही"

कैप्टेन (खिसियाते हुए, ज़िप बंद करता है जो वो आज फिर भूल गया था) :"चमटू, हँसना बंद करो, अब बात बहुत गंभीर हो गयी है, लगता है अब वक़्त आ गया हैं अपना सबसे खतरनाक हथियार वूडी-ऑइला का इस्तेमाल करने का"

चमटू: "आपका मतलब उस तेल पिए हुए डंडे से हैं ना कैप्टेन, वूडी-ऑइला! सुनने वाला तो नाम से ही मर जाए, ही ही ही" 

तभी सूक्ष्म रौशनी का झमाका होता, "लाइट आ गयी लाइट आ गयी" अरे आंटी आप! चमटू जैसे नींद की औंघाई से जागा होl 

… ये गोपनीय अड्डा और कुछ नहीं एक पेइंग गेस्ट हाउस है, जहाँ कैप्टेन कपिल और चमटू रहते है, आंटी वहां की मालकिन है।... 

आंटी: " नमूनों फ्यूज उड़ गया था, मैंने ठीक कर दिया"

"लेकिन फिर आस-पास के सारे घरो की बिजली क्यों बंद है"

"क्योंकि बाकि लोग उल्लू नहीं है जो रात के तीन बजे तक जागते रहे, आंटी ने चिल्लाते हुए दरवाजा बंद किया।" 


रोहित और निहार हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। 

"ये कैप्टेन कपिल और चमटू दोनों बस कमाल के हैं, मैं इनका कोई भी एपिसोड कभी मिस नहीं कर सकता, सुबह-सुबह ऑफिस जाने से पहले इनके कारनामे देख लो और पूरा दिन हंसते हंसते निकल जाएगा" निहार ने ठिठोली की।

"भैया लेकिन हमारे सुपरहीरो का क्या हुआ? दो वीक निकल गए अभी तक कुछ फाइनल नहीं हुआ"

निहार और रोहित दोनों भाई है, निहार 30 और रोहित 25 वर्ष का हैं, बचपन से ही दोनों सुपरहीरो के उन्मादी हैं, एक सुपर कमांडो ध्रुव और बेटमेन को आदर्श मानता है तो दूसरा सुपरमेन और नागराज को ले कर उन्मत्त रहता है। निहार का कद बढ़ गया, साइकिल के दो पहिये चार से प्रतिस्थापित हो गए, आँखों से कौतुहल उतर कर, चश्मे को निमंत्रित कर गया। गालो पर उगी ढाढ़ी ने गोलू-मोलू की उपाधि से विभक्त कर दिया। वहीँ रोहित के स्कूल बैग का वजन, कॉलेज में आते ही एक-चोथाई रह गया, सूरज से पहले जागने वाला अब, अँधेरी रातों कर अनुरागी बन बैठा, यौवन दबे पाँव घुसपैठ कर चुका है पर लड़कपन को चित्त होना बाकि रह गया। निहार और उसका छोटा भाई ऑफिस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के अलावा अभी भी अपने सपनो को जी रहे हैं। दोनों को एक नया सुपर हीरो बनाने का जूनून है जो सभी मौजूदा सुपरहीरो से अद्वितीय हो।

"रोहित मेरा रिसर्च अभी जारी है, कल सन्डे है कल डिसकस करते है", लैपटॉप बैग उठाते हुए निहार, पिताजी के चरण स्पर्श करके मिली दुआऒ को, अपने पांच साल के बेटे को सौंपते हुए, पत्नी की मुस्कान की पावती के साथ ऑफिस के लिए निकल पड़ा।

आज ऑफिस से जल्दी निकलना हैं, अपने बेटे का नए वाले मॉल में गेम्स खिलाने का 7 दिन पुराना तकाज़ा या फिर जीवनसाथी को समय ना दे पाना की शिकायत का अंत अथवा पिताजी को बीमार शर्माजी से मिला लाने का अनुरोध इनमें से किसी भी एक कार्य की सिद्धी जरूरी है।

ऑफिस! इंसानी जरूरतों को मुकम्मल करने के लिए सशर्त बनी एक मण्डली, उधर गिरधर बाबु बैठे है जिनके लिए एक दिन में दो काम करना एक अभिशाप हैं, उनकी "बने रहो पगला काम करेगा अगला" नारे में अलंघ्य आस्था हैं। निहार के आते ही गिरधर बाबु ने टोका गोयल साहब ने बुलाया है अन्दर, अभी बंसलजी की क्लास लग रही हैं उनके बाद जाना।

बंसलजी, रंग गाढ़ा, मानो किसी ने कोलतार का ड्रम उलट दिया हो, बॉस के सामने खरगोश और स्टाफ के सामने पूरा जोश, अन्दर जाने से पहले, वीररस के कशीदे पढ़ रहे थे। भीतर बॉस के तेवर से बंसलजी जी का नियंत्रण इस तरह डगमगाया की सांस को अन्दर की तरफ खीच कर तोंद को कम करने का प्रयास विफल हो गया।

बॉस! यानि गोयल साहब, मध्यम कद-काठी, किसी मूर्तिकार की रद्दी रचना, सर पर मुट्ठी भर बाल छितराए है मानो किसी ने पान खा कर पीक की गोली मारी हो, चेहरा सिंघाड़े की याद दिला दे।, 48 किलो वजनी कृशकाय शरीर के अधिपति, मुहँ खोले तो, ऑफिस के शीशे अपनी-अपनी खैरियत के लिए भगवान के साधक बन जाते है। 

"पता नहीं आज कौनसा ड्रामा होगा? वैसे ही कमर दर्द से अकड़ी जा रही है" निहार ने पेरासिटामोल पानी के साथ गटकते हुए कहाँ।
बहुधा ऑफिस में लोग घंटो सिद्ध योगीओ के समान एक ही मुद्रा में की-बोर्ड पर किटर-पिटर कर लेते हैं और अन्दर बैठा बॉस उनकी कुर्सी पर अचल और अडिग भंगिमा से भले ही तृप्त हो जाए लेकिन उसे इस बात की सुध क्यों नहीं आती की जब वो खुद नौसिखिया हुआ करता था तो, वो भी घंटो कुर्सी तोड़ कर अपने मालिक को छलता था। आपको पता है की हाकिम 8 की जगह 10-11 घंटे रोकेगा तो काम भी आपको मंध्यांतर के बाद ही याद आता है। इस उहापोह में बाबू के साथ ढकोसला करते-करते आप अपनी सेहत की बाजी लगा बैठते हैं, और बट्टाखाता तंदुस्र्स्ती के लिए आलस्य व उच्छृंखलता के स्थान पर टेक्नोलॉजी को कलंकित हो जाती है। 

बंसलजी बॉस से छूटते ही, ये निश्चित होने पर की दरवाजा बंद हो गया अब बडबडाहट अन्दर नहीं जायेगी, पीठ पर लदे फटकार और घुडकियों के गठ्ठर की अवहेलना कर, अपने चिर-परिचित अंदाज में लोट आये, "सुना आया मैं भी अन्दर, बॉस होंगे अपनी जगह, यहाँ कौन दबता हैं? गलती तो की हैं कोई अपराध तो नहीं किया ना", पतली-पतली 9-10 बालो वाली मूच्छो पर तांव देते हुए, बंसलजी सहसा जोश में आ गए, "हम उन लोगो में से है जो जेब में इस्तीफ़ा ले कर घुमते है, पचासों जॉब भरे पड़े है, लेकिन थोडा लिहाज़ है, इसलिए पड़े है, हाथ चलते रहे इसलिए आ जाता हूँ नहीं तो बीघो जमीन पड़ी हैं, दुकाने-मकानों की गिनती नहीं है, तीन पुश्ते भी कम पड़ दोनो हाथो से लुटाने के लिए" 

लोगो के लिए विस्मय की बात ये थी की, यहीं बंसलजी जो पिछले 5 मिनट में संपन्न बन गए तो पान वाले का बकाया 60 रुपया बचाने के लिए पिछले 20 दिनों से घर जाने का लम्बा रास्ता क्यों अख्तियार कर रहे है?

"निहार, विकास आज आया नहीं, तुम उसकी फाइल्स भी कम्पलीट कर दो, अर्जेंट है" गोयल साहब ने अपना फ़तवा सुनाया। 

"सर लेकिन मेरे पास पहले से ही 3 अर्जेंट असाइनमेंट्स हैं, और आज मुझे थोडा टाइम पर भी निकलना था तो वो... "

"तो, ऑफिस बंद करू दू, तुम सब लोगो को फ़ोन करके पुछू, गुड मोर्निंग निहारजी अगर आप के पास थोडा समय हो तो आज ऑफिस खोल जाए, वहां हेडऑफिस से गोलिया चल रही हैं और यंहा, सर मे आई गो टू टॉयलेट? मे आई गो अर्ली? व्हाट नॉनसेंस" 

"ये खन्ना एसोसिएशन की फाइल लो, इसे कम्पलीट करके शाम तक दो, साथ ही मटेरियल रिपोर्ट का रिव्यु और बैंक का 3 महीने का रिकोंसिलेशन भी मंडे को 11 बजे तक मेरी डेस्क पर होना चाहिए मिस्टर निहार, और हाँ टाइम पर ऑफिस आया करो।"

टाइम वाली बात ने बाकि सभी बातो को फीका कर दिया, निहार दांत पीसते हुए सीट पर आ कर बैठ गया, "यहाँ साला रात को 12-12 बजे तक रुको, कोई पीठ थपथपाने वाला नहीं है और सुबह एक सेकंड भी लेट हो जाओ तो अछूतो सा सलूक होता है। इन्हें तो वो लोग पसंद है जो ऑफिस में आते ही नींद की गोली खाले और शाम 7-8 बजे का अलार्म लगा कर उठ जाए, बस देर तक बैठ जाओ भले ही पूरे दिन एक पेपर तक हाथ में ना लो। हम जैसे लोग 8 घंटे के काम को 4 घंटे में कर दे तो क्या हाफ डे में घर जाने के लिए कह देंगे?" 

उधर रोहित कॉलेज पहुंचने को है, अगले मेट्रो स्टेशन पर ही है कॉलेज हैं, शायद मेट्रो में लोगो को देख कर 'सुपरहीरो' के कोस्ट्युम का आईडिया आ जाए। रोहित को बचपन से ही सुपर हीरो बनने शगल था, मम्मी का ब्लैक स्कार्फ को पीछे बाँध कर 'बेटमेन' बनना हो या गत्ते को स्टार की शेप में काटने के बाद नेकर के बटन पर चिपका, पापा की मोटर बाइक पर बैठ कर, चिल्लाना मैं हूँ 'सुपर कमांडो ध्रुव'। वो तो बाद में मालूम चला की वो गत्ता नहीं, पापा की इम्पोर्टेन्ट फाइल थी। डांट की वेदना ने भोजन से मोह भंग कर दिया, लेकिन जब स्नेहभाजन भिन्डी की सब्जी की बोध हुआ तो भोजन अस्वीकरण का कड़ा निश्चय सहर्ष वापस लेना पड़ा। 'ध्रुव' से प्रभावित रोहित हमेशा पठन-वाचन में अव्वल रहा। निर्भीकता, खरापन, नैतिकता व स्थिरता ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा। 

सामने खड़े किशोर की नीची उतरती जीन्स ने कॉस्टयूम के आईडिया में खलल पैदा कर दिया। मेट्रो में नीचे झुके आधुनिक चेहरे ज़मीं से अभी काफी दूर है। झुके हुए चेहरे,जो कभी केवल इम्तिहान के समय हर देवीय मूर्त के समक्ष स्वयं नतमस्तक होते थे, उन्हें देख कर ये निचोड़ निकलता है की आज के ज़माने में केवल वही सर उठा कर जी सकता है, जिसके पास स्मार्ट फ़ोन ना हो ही ही ही। सनातन काल से उच्चतर होने की प्रतिद्वंद्विता अस्तित्व में रही है, उच्चतर होने के क्रम में सौंदर्य व सौष्ठवता अग्रणी रहे है यद्यपि फेसबुक काल में आपकी सौंदर्यता तब तक ही जब तक आपका 30 दिवस का फोटोशॉप ट्रायल पैक एक्सपायर नहीं हुआ हो हा हा हा ।

रोहित का ध्यान, वहां कुछ छात्रो के समूह पर गया, 

एक ने कहा "बेटा कर कॉलेज में प्लेसमेंट है, प्रैक्टिस करते है, मैं इंटरव्यू लेता हु तेरा",

"हम्म तो आप प्रोग्रामिंग एंड लैंग्वेजेज के बारे में कितना जानते है?" 

"तेरे से ज्यादा जानता हु"

"आपकी स्ट्रेंथ क्या है"

"मैं तेज शोर-गुल वाली क्लास में भी सो सकता हूँ, 2 लीटर पेप्सी एक सांस में पी सकता हूँ" 

"आप की होब्बीज क्या है?"

"बस को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागना, देर रात जाग कर टोरेंट से डाउनलोड की हुयी 2 -3 मूवीज बेक टू बेक देखना, 

(तेज ठहाको से वो कोच गूँज उठा)

"अबे ऐसे देंगा इंटरव्यू"

"यार सच तो यही है, लेकिन मुझे कौनसी हीरोगिरी करनी हैं सच बोल कर, वो ही कॉलेज वाला रट्टा, वहां भी शुरू कर दूंगा" 


मेट्रो स्टेशन से नीचे उतर कर चिप्स के खाली पैकेट रोड पर फैंक कर छात्र, कॉलेज के तरफ लपके। रोहित को बैटमैन की मूवी 'डार्क नाईट राय्जेज' याद आती है जिसमे अपाहिज हीरो अपनी गोथमसिटी को मुसीबत में देख कर अपनी शारीरिक अक्षमता को भूल फिर से अपने शहर के लिए सभी खतरों से टकरा जाता है और ये लोग अपने शहर को बदरंग करने में भी कोई आमोद ढूंढ रहे है। रोहित की उग्रता ने उन छात्रो का ध्यानाकर्षण तो किया लेकिन दो टूक जवाब से उन्होंने इससे इति कर ली। "आस-पास डस्टबिन नहीं कहाँ फैंके" 

रोहित ने 'सुपर कमांडो ध्रुव' की कॉमिक्स मैं अनेको बार कई जगह पढ़ा हैं की जब ध्रुव (जिसके पास दुसरे सुपरहीरो के सामान कोई अलौकिक ताकत नहीं है) किसी भी दुष्कर और असाध्य खतरे या स्थिति में होता है तो वो उससे निपटने के लिए वहां मौजूद चीजों का ही इस्तेमाल करता है वो बहाना नहीं बना सकता की मेरे पास ये नहीं हैं, वो नहीं है, तो मैं इस बाधा से कैसे पार पाऊ। आप को हर परिस्थिति का सामना उपलब्ध संसाधनो से करना है। रोहित ने वो रेपर उठाये और अपने बैग में रख लिए। 

सात बज चुके हैं निहार पहले ही लेट हो चूका है, "ये क्या 2007 और 2009 में खन्ना एसोसिएशन को गलती से दो बार स्कीम क्रेडिट नोट इशू हो गया वो भी टोटल 83 लाख का, केश या बैंक ट्रांजेक्शन होता तो इजीली पकड़ा जाता, लेकिन फायदा क्रेडिट नोट के थ्रू गया है, ये विकास भी क्या करता है? इतनी बड़ी मिस्टेक को अभी तक नहीं पकड़ पाया। बॉस को बताना पड़ेगा, एक मिनट! बॉस को बताने का मतलब हैं 4 घंटे और ऑफिस में बैठना और फिर अगर ये फाइल मेरे पास नहीं आई होती तब भी 83 लाख का लोस कौन सा पकड़ा जाता, जो चल रहा हैं, चलने दो।" 

रास्ते में जल्दबाजी और हडबडाहट में रेड सिग्नल का ध्यान नहीं रहा, कांस्टेबल ने रोका, 

"पाँचसौ का चालान कटेगा" 

"लेकिन मैं... तो... "

"500 रखो, रसीद लो और आगे बढ़ो" 

कुछ समझौता वार्ता के बाद उदार, स्वार्थहीन, भद्र सज्जन ने सौ रुपये लेना स्वीकार किया, बस शर्त थी की रसीद नहीं मिलेंगी। निहार को थोडा सा अपराध बोध हुआ लेकिन फिर सोचा मुझे कौनसे नैतिकता के झंडे गाड़ने हैं।

"आज का तो दिन ही ख़राब है, अब घर जा कर आज कौन सा बहाना बनाऊंगा, काश की मैं सुपरहीरो होता और सब कुछ ठीक कर देता"

खैर निहार साहब घर पहुँचे, पिताजी को कल के लिए आश्वत किया, पूरे दिन से तैयार पिताजी को दोस्त (शर्माजी) से ना मिल पाने का विषाद, निहार की आखों से छिपा नहीं रहा। पत्नी की अनकही शिकायत को मुस्कराहट से कम करने का प्रयास भी कमतर ही रहा, बेटा की नाराज़गी से तो निंदिया रानी ने बचा लिया, जो पापा से उलट, हमेशा समय पर आती है। 


अगले दिन, रविवार सुबह, दोनों भाई टीवी के सामने।

'कैप्टेन कपिल और गुच्चु गमछा'

चमटू: "कैप्टेन मैंने सुना है की गुच्चु गमछा एक नंबर का वाहियात, जलील और बैगैरत बन्दा है"

कैप्टेन: "लोग तेरे बारे मैं भी ऐसा ही कहते है" (जोरदार ठहाका)

चमटू : "कैप्टेन मैंने हवा में उड़ने वाला सूट बना लिया"

कैप्टेन: "शाबाश चमटू, इसकी मदद से गुच्चु गमछा ज्यादा देर तक बच नहीं पायेगा, ला वो सूट मुझे दे"

चमटू: "लेकिन बॉस वो सूट केवल हवाई जहाज में ही पहन सकते है, तब ही तो उड़ पायेंगे ही ही ही" 

"वो देखो कैप्टेन सामने साइकिल पर गुच्चु गमछा आ रहा है"

"हाँ भाई पेट्रोल जो इनता महंगा है, बंदा एको-फ्रेंडली हैं। लेकिन यहाँ साइकिल पार्किंग बहुत महँगी है, उससे ये मुलकात बहुत महँगी पड़ेगी" 

गुच्चु गमछा: (पार्किंग चार्जेज देने के बाद बचे हुए छुट्टे पैसे गिनते हुए) "पचास पैसे कम है, धोखा हुआ है गुच्चु गमछा के साथ, इस पचास पैसे की छनक 87 दिन तक गूंजेगी, दुनियावालो"

"कैप्टेन कपिल! और चमटू! तैयार हो जाओ मरने के लिए"

कैप्टेन: "प्लीज वेट, थ्री मिनट्स ओनली"

गुच्चु गमछा: ???

कैप्टेन: "जल्दी कर चमटू , वो लाल वाला ठीक रहेगा, अरे ये थोडा नीचे कर, हां अब ठीक है, इसका बटन बहुत टाइट है " 

चमटू: "कैप्टेन आप तो जम रहे हो" 

गुच्चु गमछा : (चिल्लाते हुए) अरे कोई बतायेगा ये हो क्या रहा है? मेने साइकिल किराए पर ली है, मुझे जल्दी जाना है, (धीमी आवाज़ में) प्लीज मुझ से लड़ लो, प्लीज मर जाओ ना"

कैप्टेन: "भाई तूने ही तो कहा था की मरने के लिए तैयार हो जाओ, इसलिए हमने मरने के लिए स्पेशल ड्रेस सिलवाइ थी आज पहली बार पहन का देखा है, अब तैयार होने में थोडा तो टाइम लगता ही हैं, स्माइल प्लीज" (खुद की और चमटू की फेसबुक के लिए ऑटो मोड पर फोटो लेते हुए)

गुच्चु गमछा: "हा हा हा मैंने कहाँ मरने के लिए तैयार और तुम लोग वाकई वैसे वाले तैयार… हा हा हा… हा हा हा" (धम्म, जमीन पर धडाम) 

… गुच्चु गमछा हँसते-हँसते मर गया, हंसी ही इसकी कमजोरी थी। एक बार फिर कैप्टेन कपिल और चमटू ने दुनिया बचा ली। (हा हा हा)… 


रोहित और निहाल बच्चो की तरह खिलखिला कर हंस पड़े। 

"सही है हर प्रॉब्लम की तोड़ है हंसी"

"एक लाफ्टर एक स्माइल पूरी टेंशन को धो डालती हैं"

"भैया हमारा सुपर हीरो भी हँसमुख होगा, विलेन का भी थोडा एंटरटेनमेंट हो जाएगा हा हा हा"

रोहित , एक हंसमुख व्यक्ति अपने आप में सुपरहीरो है, कल का दिन अच्छा नहीं गया, लेकिन अगर चेहरे पर मुस्कान होती तो शायद इतना बुरा नहीं जाता।"

"सही कहा भैया, काफी रिसर्च करने पर मैं मानता हूँ की हमारा सुपरहीरो बाकि हीरो की तरह ड्यूटीफुल, डेडिकेटेड, आइडियलिस्टिक, हेल्पफुल, फ्रैंक, बोल्ड, फिट, जेनरस और फैथफुल होना चाहिए लेकिन उसके पास कोई सुपर नेचुरल पॉवर नहीं होगी"

"सुपर कमांडो ध्रुव और डोगा की तरह?"

"हाँ, लेकिन वो इन दोनों से भी थोडा अलग होगा"

"अलग?"

"अलग!, क्योंकि वो लिविंग सुपरहीरो होगा, बिलकुल जीता-जागता रियल लाइफ सुपरहीरो , स्क्रीन और कॉमिक्स फ्रेम से बाहर"

"रोहित तू, पागल हो गया क्या? लिविंग सुपर हीरो कहाँ से आएगा" 

"भैया, वो आप हो!"

"जबसे समझ आई है, आप को ही आदर्श माना हैं, आप के कंधो पर बैठ कर दुनिया के उतार चढाव समझे हैं, आप में वो सब क्षमताये हैं जिनसे एक सुपरहीरो बनता है"

निहार सकते में आ गया, सहसा छाती में एक उबाल उठा की इस मिथ्या, बनावटी, आभासी प्रतिरूप को खींच कर उतार दू और चिल्ला-चिल्ला कर बोल दू की मेरे जैसा अधर्मी, अविश्वसनीय, अनुत्तरदायी, छली, मंथर और संयमहीन भला कौन होगा, लेकिन रोहित के सजल आँखों में छलक रहे विश्वास और प्रेम ने उसकी जिह्वा को भीतर ही समेट दिया।

रविवार सुबह निहार और अवकाशों से भिन्न जल्दी उठा, बेटे को कंधे पर बैठा उद्यान की सैर करवाई, खेल रहे बच्चो को लंगड़ी-टांग सिखाया, तथापि इस खेल में बचपन से चली आ रही अपराजेयता को निहार ने कुछ मासूम खिलखिलाहट के लिए गँवा दी। विषाद और उदास समझे जाने वाली बुजुर्ग मण्डली में निहार के सम्मिलित होते ही हंसी ठट्ठा की खोज हुयी। आरोग्यता हेतु योगा किया जो वर्षो किये जा रहे स्वांग और समयाभाव दलीलों से कभी स्मरण नहीं हुआ। आखिर सुपरहीरो के लिए फिटनेस तो अहम् है ही। रुग्ण शर्माजी की पिताजी से भेंट करवाई, लगे हाथो कुछ धार्मिक पुस्तके अप्रत्याशित उपहार दे कर सौभाग्य के वरदान भी बटोरे।

श्रीमती को दोपहर सिनेमा चलने का प्रस्ताव रखा। 
"दोपहर नहीं रात को चलेंगे"
"रात को भी चल सकते है लेकिन एक रिस्क है"
"रिस्क?"
"कहीं लोग आपको चाँद समझ कर अपना व्रत न तोड़ ले"
प्रेम पर वर्षो बाद पुराना रंग चढ़ गया। 

संध्या से पहले मोहल्ले की पगडण्डी पर लगे सभी पौधों को आवरण से संरक्षित किया। काफी समय बाद, शाम को पुराने दोस्तों के मेसेज पढने के बजाय उनकी आवाजे सुनी, अगले दिन पहली बार कोई स्वेच्छापूर्ण गोयल साहब के केबिन मैं घुसा, खन्ना एसोसिएशन वाली बात बताते हुए उस का रिकोंसिलेशन का स्टेटमेंट सुपुर्द करके गोयलजी के मुहँ से प्रशंसा सुनने वाले दुनिया के इकलौते और प्रारम्भिक व्यक्ति बने। 

उधर रोहित मंद-मंद आनंदित हो रहा हैं, क्यों ना हो, कल तक सबके लिए अनचाहे बनते जा रहे बड़े भैया से एक झूठा पर मीठासा विश्वास दर्शा कर उसने असली सुपर हीरो की खोज कर ली थी, जो बच्चो के खिलखिलाहट, बुजुर्गो की दुआओं, दोस्तों की मस्ती, हमसफ़र के प्रेम, अभिभावकों के सपनों, समाज की जिम्मेदारी और प्रकृति की ख़ूबसूरती में समाया है। 

"भैया आप तो सुपर हीरो बन गए, अब मैं क्या बनू"
"तू मेरा 'चमटू' हैं ना" हा हा हा...

रचियता: कपिल  चाण्डक 
Author: Kapil Chandak



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Wednesday, July 31, 2013

ये जो देश है मेरा



"शैली, पता है आज मेरे पापा आ रहे है सात दिन यही रहेंगे मेरे जन्मदिन तक" 

विद्यालय में छुट्टी की घंटी की सुहानी गुंजन के साथ 'नन्ही' के पैरो में मानो पंख लग गए। 
यो ओ"… वन में दौड़ते हिरनों की भांति कुलांचे भरती हुयी नन्ही बाहर की और भागी।

इस उपक्रम में साइकिल सवार ग्वाले ने अपना संतुलन खोया, पडौसी चाची की महत्वाकांशी रंगोली की शिनाख्त मुश्किल हुयी, आठ साल के बबलू की पतंग ने आसमान की जगह सड़क पर बह रहे पानी में अपनी नियति ढूंढी, बछड़े ने मासूम गोदी में प्यार पाया, दामोदर काका के खेतो ने कुछ गन्ने और गंवाए, लाला ने जुबानी खर्चे की कीमत पर मिठाई का त्याग नहीं करने की हिमाकत पर ठेंगा और कंजूस का तमगा पाया, पंडित जी ने भगवा कपड़ो को मिट्टी की खुशबु से रूबरू होने से पहले आगाह किया "बेटी संभल कर भागो, अरे कूदना मत, धत तेरे की, पंडिताइन बाल्टी भर दो, फिर से नहाना पड़ेगा"

अंततः प्रचंड पर-अहित के बिना नन्ही ने स्कूल से घर तक का सफ़र तय किया। 

"पापा आप आ गए!" बांहों से होती हुयी नन्ही पापा के कंधो पर जा बैठी, और पूरी दुनिया की सर्वेसर्वा हो गयी।

रात का खाना हो चुका था। नन्ही की दादी दिर्घाहार के कारण अभी भी जिव्हा सुख का रस्वादन में मगन थी। नन्ही, मम्मी और पापा सब दादी के साथ ही रहते है। पापा 'अर्जुन सिंह" फ़ौज में है, घर से दूर रहकर देश और परिवार दोनों का ही संरक्षण करते है। मम्मी, नन्ही का बचपन और घर संवारती है। नन्ही कुछ दिनों में 10 साल की हो जायेगी। 

"पापा ये आपके लिए"
"ये क्या है?"
"अरे ये तो रंग गोरा करने के क्रीम है, फेयर एंड फेयर! ये मेरे लिए है? क्यो?" 
"कुछ दिनों पहले इसने हमारी शादी वाली एल्बम देखी तो कहती है मम्मी, पापा शादी के समय इतने गौरे थे अब तो रंग थोडा डार्क हो गया है, पापा आयेंगे तो उनके लिए फेयर एंड फेयर लाऊंगी ताकि पापा और भी हेंडसम लगे पहले की तरह" मम्मी ने मीठा खुलासा किया।

"पापा मैंने टीवी पर देखा है की जो गौरे नहीं होते उन्हें जॉब नहीं मिलती, कोई उनकी सिंगिंग पसंद नहीं करता, उन्हें कामयाबी नहीं मिलती और जो फेयर एंड फेयर लगा कर गौरे हो जाते है उन्हें जॉब मिल जाती है, सिंगर बन जाते है, हीरो बन जाते है, हर जगह छा जाते है, दुनिया उनके पीछे पागल हो जाती है"

अर्जुन सिंह सोच मैं पड़ जाते है की हम फौजी बाड़मेर के तपते रेगिस्तान मैं 48 डिग्री पर भी डटे रहते है, ताकि घरो मैं ए.सी. के नीचे लोग बाहर झुलसती गर्मी को चिढ़ा सके, दिन-भर चलती रेत की पैनी आंधिया हर अंग को छलनी कर देती है, लेकिन जज्बे से भरी आत्मा को नहीं भेद पाती। अपनों के बिना रेगिस्तान की ठंडी राते भी तारो की अंतहीन गिनतियों की भेंट चढ़ जाती हैं। देश की रक्षा की कीमत में अनेको मूल्यहीन चीजों का न्योछावर करने में क्रम में उनका हुलिया तो फिर बहुत पीछे है। हुलिया तो ऐसा हो की दुश्मन हमारी परछाई से भी खौफ खाए, यही हमारी ख़ूबसूरती है, तब ही देश के असली गहने कहलायेंगे।

"बेटा यही तो ट्रेजड़ी है की ऐसी बाते जिम्मेदार मीडिया के जरिये भी फ़ैल रही है, ऐसी गुमराह बातों को तरजीह दी जाती है की देश के हीरो तो फेयर और हेंडसम लोग है। अगर ऐसा होता तो आज भी हमारा देश गोरो का गुलाम होता, हम काले लोग, गोरो से उनकी छाती पर चढ़ कर हलक से आज़ादी नहीं छीन पाते"

"पापा सही कहा आपने; आप को इसकी क्या जरूरत आप तो सबसे हेंडसम हो, 6 फीट लम्बे, हट्टे-कट्टे, अकेले ही 100 लोगो को धुल में मिला दो "

सात दिन, महीने भर बाद मिली पगार की तरह जल्द ही खर्च हो गए। नन्ही के पापा देश के दुश्मनों की आँखों की किरकरी बनने फिर से राजस्थान-पकिस्तान की सीमा पर चले गए। रात में एक बार फिर से पडोसी देश ने अकारण फायरिंग शुरू कर दी। दिन-भर के सफ़र की थकान जोश और फ़र्ज़ के आगे नत-मस्तक हो गयी। सुबह करीब 6 बजे दोनों तरफ से आग उगलते दानवो ने अवकाश लिया। घायल साथियो का इलाज शुरू हुआ। 

"आराम से राघव, ज़ख्म गहरा और ताज़ा है", अर्जुन ने टोका। 
"ये जख्म नहीं, तमगे है हमारे, इस दर्द से कैसा बैर"
"वो छावनी पर लहरा रहा तिरंगा देख रहा हैं, अर्जुन; भारत माँ का आँचल है वो, माँ की गोद और दर्द तो कभी ना मिलने वाले दो किनारे है, गोद में भला उसका बच्चा बिना मुस्कुराये रह सकता है?" राघव मुस्कुराया और भारत माता की गोद में अंतहीन मीठी नींद में खो गया। 



तेरी ही मिट्टी में जन्मा मैं माँ,
फिर तेरी ही मिट्टी का जर्रा बना।

तू ही है आसमां, साया मेरा,
तू ही बंदगी, तू मेरा खुदा।

तेरा ही लहू, नसों में बहा,
तुझ से मिला मैं, अब जुदा हु कहाँ।


एक और साथी की वियुक्ति की टीस, अर्जुन के सीने में धंस गयी। वो रात अर्जुन को अनुत्तरित सवालो से द्वंद करने के लिए छोटी लग रही थी।
"क्या गुज़र रही होगी राघव के परिवार पर, माँ-बाउजी, पत्नी और बच्चे कैसे ये संताप सहेंगे। कैसी त्रासदी है? जब बन्दूक से निकली गोली किसी को वापस जिंदा नहीं कर सकती, वो तो केवल बच्चो को अनाथ, मांग और गोद को सूनी ही करती है, तो फिर गोलिया बनती ही क्यों है? क्यों बनाते है हम लोग इसे? कहने को पूरा जहाँ भगवान ने हमारे लिए बनाया हैं और यहाँ जमीन-आसमान सब बंट गया, खून किसी का भी बहे, सरहद के इस पार या उस पार; खून तो इंसान का ही होगा, 

उधर नन्ही दुनियादारी से दूर माँ के हाथों का गरमा गरम खाना खा रही थी। 
"माँ पता है आज, बड़े वाले पार्क में, मैं और शैली खेल रही थी तब वहाँ कुछ लोगो ने पिकनिक मनाने के बाद बचा हुआ कचरा डस्टबिन की जगह वही किनारे पर फ़ेंक दिया, मैंने टोका की अंकल प्लीज डस्टबिन मैं कचरा डालिए नहीं तो पार्क गन्दा हो जायेंगा। अंकल ने कहा की डस्टबिन थोडा दूर था, लेकिन कोई बात नहीं मैं उसी में कचरा डाल देता हूँ, तभी दुसरे अंकल ने उन्हें रोका, 
"क्या सक्सेना साहब आप भी बच्चो की बातों पर गौर कर रहे हो। यहीं डाल दीजिये कचरा, दुसरे लोगो ने भी यंहा डाला हुआ है, सक्सेना साहब ये इंडिया है, अमेरिका नहीं "

"माँ अंकल ने जब कहा की ये इंडिया हैं, तो मुझे बहुत बुरा लगा, उनके बोलने के अंदाज़ में वो अभिमान और सम्मान नहीं था जो पापा के 'इंडिया' बोलने में होता है" 

माँ और दादी दोनों ही स्तब्ध रह गयी।

"बेटा, अगर तुम, अपनी क्लास मैं फेल हो जाओ तो क्या मैं और दादी, घर-घर जाकर लोगो से तुम्हारी बुराई करेंगे?

"नहीं माँ आप तो चाहोगे की मैं ज्यादा अच्छे से पढू, आप मुझ पर ज्यादा ध्यान दोगे, मुझे मोटीवेट भी करोगे"

"और जब तू अच्छे अंको से पास हो जायेगी तो मिठाई भी बाटेंगे", दादी ने चुटकी ली।

"पता है नन्ही, हम लोग ऐसा क्यों करेंगे? क्योंकि तू हमारी अपनी है, हमारा परिवार है, इसलिए हम निंदा करने के बजाय, तुम्हारी मदद करेंगे ताकि तुम बेहतर बनो और यहीं हमारी खुशियों का बहाना बनेगा। 

"बेटा ये बहुत बड़ी त्रासदी है की लोग अपने देश को अपना परिवार नहीं समझते, नहीं तो व्यंग कसने के बजाय उस चीज़ को सुधारते और गरूर करते। वो समझे ना समझे पर देश तो उन्हें अपना मानता हैं, माँ की तरह बिना शर्त अपनी गोद मैं खिलाता है, पिता की तरह जिंदगी भर अपने साए में महफूज़ रखता हैं, मिटटी से मिटटी तक का सफ़र साकार करता हैं। कभी कोई अपने माँ-बाप को किसी से कम्पेयर नहीं करता फिर ये लोग देश को और उसके विकास को किसी दुसरे देश से क्यों नापते है?" 

आर्डर आया है, सुबह 5 बजे उत्तराखंड के लिए कूच करना है, लाखों जाने फंसी है केदारनाथ में। अर्जुन सिंह 4 बजे ही मुस्तैद हो गए। भारी बारिश और भूस्खलन के बाद केदारनाथ में हजारो-लाखो लोग मलबो में फंसे, मदद का इंतजार कर रहे है। नेता अपनी-अपनी जीभ की नुमाइश कर रहे है। मीडिया अलग अलग मन बहलाऊ तरीके से खबरे दे रहा है। इन सबके बीच स्थानीय लोग और भारतीय सेना फरिश्तो का फ़र्ज़ निभा रही है। 

तीन-चार दिनों में विरोधी मौसम के बावजूद हजारो लोगो को सुरक्षित निकाल लिया गया फिर भी स्थिति बदत्तर होती जा रही है। वहां का वीभत्स दृश्य अकल्पनीय हैं हर तरफ लाशें ऐसे फैली है की खुद के जिन्दा होने पर भी संदेह हो जाए। अर्जुन एक मासूम चीत्कार की तरफ दौड़ा, उधर एक हाथ मलबे से बाहर आने को है, हाथ पकड़ कर खींचा, हाथ उखड कर हाथों में ही रह गया, कलेजा सन्न हो गया, लाशें क्षत-विक्षत होने के साथ-2 गंदे पानी में सड़ चुकी है। विदीर्ण हृदय के साथ उस हाथ को धीरे से भूमि पर रख दिया। वज्राघात तो अभी बाकि था, "ये क्या हाथ की एक अंगुली तो ताज़ा कटी हुयी है, हे इश्वर किसी राक्षस ने अंगूठी के लिए…" 

वापस वहीँ करुण 'चीख', उस पुकार की दिशा में झाडियों के पीछे गया वहां एक बेसुधसा बच्चा छटपटा रहा था, उसने ऊँगली से ईशारा किया, अर्जुन ने पलट कर देखा, "पूरी स्कूल बस ही उलटी पड़ी है", घर को अपनी रौनक से महका देने वाले बच्चो की लाशो से भंयकर दुर्गन्ध आ रही थी। "हे महादेव कैसी बेरुखी हैं और क्या-क्या देखना रह गया मुझे" बच्चे को गोद मैं ले कर राहत शिविर की तरफ दौड़ा।

उधर नन्ही के गाँव के बड़े मंदिर में धार्मिक कार्यकर्म उन्माद पर हैं, बाहर जुलुस की तैयारी हैं, हाथी, घोड़े, बाजे-गाजे, ढोल-मंजीरा, मिठाई-फूल, झंडे-झंडियां सभी बच्चो के लिए कौतुहल का सबब बनी हुयी हैं। भक्तजन का अलौकिक आन्नद चरम पर है। नृत्य, भजन-गान के इस माहौल मैं हर कोई यति - योगी जान पड़ता हैं। 

अनायास उत्सवी उल्लास के वातावरण में खलल हुआ, किसी अनैतिक तत्व ने जुलुस पर कचरा फ़ेंक दिया। निठ्ठले हुडदंगियो को मौका मिला। कभी शिव लिंग पर जल नहीं चढ़ाया; आज धर्म के नाम पर मासूमों पर चढ़ाई को तत्पर है। कभी कुरान को छुआ नहीं आज हाथ से तलवारे नहीं छूट रही। सोते गाँव में तांडव जाग उठा, दंगाइयों ने घर फूँक दिए, सपने जला दिए।

उधर केदारनाथ धाम में आधी रात को भी अर्जुन के अरमान नहीं बुझे। "अंकल!", मदद के लिए चीख-चीख कर थके हुए गले से आई इस थर्रायी हुयी आवाज़ ने अर्जुन को भी कंपा दिया। "मेरे बाबा उधर पत्थर के नीचे दबे है" पीछे खड़े लगभग 12 साल के लड़के ने एक तरफ इशारा करते हुए कहाँ। बूढा शरीर संवेंदना शुन्य आँखों से मौत की बाट जोह रहा था। 

"आप घबराइए नहीं मैं अभी आपको निकाल लूँगा।",बाबा के दोनों पैरो पर चट्टान आ गिरी है, सारा दर्द 3 दिन में बह कर जम गया। अर्जुन ने शरीर में बचे शक्ति के आखरी ज़र्रे का इस्तेमाल करते हुए चट्टान को एक तरफ धकेल दिया। बूढ़े बाबा को लगा 'वर्दी में भगवान' आए है। 

माँ ने नन्ही को गोद में लिया और जलते मकान से झुलसते हुए हुए जिंदगी की दिशा मैं भागी, नन्ही की दादी सुबह ही शहर अपने भाई के यहाँ चली गयी थी। "मम्मी अब हम कहाँ जायेंगे, वो लोग तो सामने वाले रास्ते में भी है", "बेटा तू इस बड़े पाइप में छुप जा, मैं उस पेड़ के पीछे चली जाती हूँ; घबराना मत मैं यही हूँ"। 
दंगाईयो की राह भटक गयी एक गोली, माँ के ममतामयी दिल से जा चिपकी, अंतिम बार नन्ही को देखने की हसरत दिल में समेटे, कटे वृक्ष की भांति निष्प्राण धरती पर आ गिरी। 

कैसी बिडम्बना है एक तरफ नन्ही के पापा रक्षक बन लोगो की दुआए लूट रहे हैं, दूसरी और किसी हैवान ने उसकी मम्मी को दुआ कबूल करने के वाले खुदा के पास भेज दिया। नन्ही की आँखे ऊपर चढ़ गयी, कलेजा फट जा रहा था, अँधेरी सिसकती रात में उसे माँ की लाश के पास बैठे देख, धर्म के मर्म से बेगाने पशुओ के दिल तो नहीं लेकिन आस-पास के पत्थर जरूर भी पिघल गए ह़ोंगे। 

अर्जुन सिंह गाँव पहुंचा, फ़र्ज़ के लिए पसीने की जगह खून बहाना उन्हें कभी नागवार ना हुआ लेकिन आज रक्त अश्रु की वेदना असह्य प्रतीत हो रही है। नन्ही दौड़ कर पापा से लिपट गई। आँखों में अथाह वेदना, निस्तेज चेहरा देख कर उस शूरवीर का शरीर भी जर्द हो गया। पापा के घर आने का उन्माद, दुःख के आवेश में विलीन हो गया। पापा ने नन्ही के सर पर हाथ फेरा, माँ की कमी को कैसे झुठलाऊ, आँखे फूल गयी है; लेश्मात्र भी आशंका नहीं थी की प्रियतम यूँ मझधार मैं छोड़ जायेगी। 

दो मोटी बूंदे, नन्ही के गालो से लुढ़कती हुयी, पापा के हाथों में समा गयी, अर्जुन के हृदय पर नश्तर चलने लगा। वो सोच मैं पड़ गया "बिना माँ के बच्चा ब्रह्माण्ड में अकेला होता हैं, माँ साथ हो तो पूरी दुनिया पास होती हैं। बच्चे की तोतली बोली जग के लिए भले ही हंसी का कारण हो लेकिन माँ के लिए मुस्कुराने का बहाना होती है। मनपसंद पकवान खा कर निंदिया मग्न बच्चे को कहाँ ध्यान की माँ ने ये रात भी फाको से गुजारी है। रेलगाड़ी के इंजन का तेज भोंपू भी दिन भर की भाग-दौड़ के बाद गहन निंद्रा से माँ को जगा पाने में विफल है वहीँ बच्चे का सूक्ष्म क्रंदन सौ कदम की दूरी से माँ को खीच लाता है, कैसे रहेगी नन्ही अब माँ के बगैर?"


तू माँ है मेरी, मैं हूँ तेरा गुरुर,
क्यों छोड़ा अकेला, मेरा क्या कसूर।

माँ कह देना, तू आएगी जरूर,
नादां हूँ मैं थोड़ी, ना रहना यूँ दूर।

तू कहती हैं ना, बेटा तू हैं मेरा नूर,
क्यों रूठी हैं माँ तू, क्या हो गयी भूल।


सात साल गुज़र गए।

"नन्ही, बेटा इतनी सुबह-सुबह कहा जा रही हो?, 15 दिनों के लिए ही आया हूँ, पापा के पास भी तो बैठो थोड़ी देर"
"पापा बस अभी दो घंटे मैं आई, फिर सारा दिन ढेर सारी बातें करेंगे "कहते-कहते नहीं ने स्कूटी स्टार्ट की।

"बेटा, मंदिर के पास वाले मैदान में तीन महीने पहले करीब 150 पोधे लगाए थे, रोज़ सुबह जा कर उन्ही को पानी देकर आती है; कहती है दादी, पूरे गाँव को फिर से हरा-भरा कर दूंगी" 

"माँ, कुए के पास जो कच्चा रास्ता था, वहां भी तो नन्ही ने सरकारी ऑफिस में चक्कर लगा-लगा कर पक्की सड़क बनवा दी, अब तो बिजली वाले भी डरते है बार-बार बिजली काटने से, कहीं नन्ही आ कर धरना ना दे दे"

"तूझे पता नहीं, शाम को सरपंच जी के आँगन में गाँव की बुजुर्ग औरतो और पुरुषो को पढ़ाती है, कभी-कभी तो मुझे भी खींच ले जाती है। 

"एक दिन कह रही थी, दादी, मेरी माँ नहीं रही तो क्या, मेरी भारतमाँ तो हमेशा मेरे साथ रहेगी, मैं अपने मातृभूमि को माँ की तरह प्यार करती रहूंगी। देश और देशवासी उन्नत रहे यही मेरा ध्येय है; और फिर मेरी भारतमाँ को कोई विकृत धर्म का ठेकेदार भी मुझसे छीन नहीं सकता क्योंकि इसका कोई एक 'धर्म' जो नहीं है, यह तो हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी"

"भारत माँ की इस बेटी को सलाम" अर्जुन ने सजल नेत्रों से कहा। 

रचियता: कपिल  चाण्डक 
Author: Kapil Chandak


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